1857 की क्रांति इतिहास के पन्नों में सदैव अमर है 1857 की क्रांति का संघर्ष को लेकर इतिहासकारों के मत अलग-अलग है मत हैं। कुछ विद्वानों को मानना है कि चार महीना का यह उभार किसान विद्रोह था तो कुछ महान व्यक्ति इसको सैन्य विद्रोह मानते हैं।
अलग-अलग विद्वानों के अलग-अलग मत हैं वी.डी सावरकर की पुस्तक द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस जो 1909 में प्रकाशित हुई थी। जो गदर के रूप में भी वर्णित है, मंगल पांडे के द्वारा कोलकाता के निकट बैरकपुर छावनी में किए गए विद्रोह को एक महत्वपूर्ण घटना माना गया है जो स्वतंत्रता की प्रथम लड़ाई है।
भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी कल में ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन की स्थापना के केंद्र में सेवा की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। गवर्नर जनरल के तौर पर वारेन हेस्टिंग के शासनकाल में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राज्यों को क्रमशः अधिकरण से उसके क्षेत्र का साथ-साथ सेवा का लगातार विस्तार किया जा रहा था। ब्रिटिश सेवा में 80% से अधिक भारतीय मूल के लोग नियुक्त किए गए थे। यूरोपीय सैनिकों के विपरीत उन्हें सिपाही का दर्जा मिला था।अभी तक हम प्लासी और बक्सर की लड़ाई के में इन सिपाहियों की भक्ति ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रति देख चुके थे।
इस विद्रोह का एक महत्वपूर्ण तात्कालिक कारण 1857 का सैनिक विद्रोह था। तात्कालिक कारण में 1853 की राइफल के कारतूस की खोल पर सूअर और गाय की चर्बी का लगा होना था। मुस्लिम सैनिक सूअर और हिंदू सैनिक गाय की चर्बी को अपने मुंह से निकलेंगे क्योंकि यह कारतूस पर लगी हुई होती थी और सबसे मजबूत हड्डी हमारे दांत की होती है जो कि इसको निकलेगी। दांत से निकलना आसान होता हैं। यह बात हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्म के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा रही थी। यह राइफल 1853 के राइफल के जखीरा के हिस्सा थी।
1857 की क्रांति:-
यह क्रांति कोई आकस्मिक क्रांति या घटना नहीं थी अभी तो 1857 की क्रांति अनेक कर्म का परिणाम मात्रा थी जिसमें राजनीतिक आर्थिक सामाजिक धार्मिक और प्रशासनिक तथा सैनिक कारण थे।
आईए जानते हैं इन कॉमन को विस्तार से
1857 की क्रांति के कारण:-
1857 की क्रांति के राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक कारण थे जो इतिहास के सुनहरे पन्नों पर अपनी छाप छोड़ गए थे।
राजनीतिक कारण:-
1.डलहौजी की साम्राज्यवादी नीति:-
लॉर्ड डलहौजी ने भारत में अपना साम्राज्य विस्तार करने के लिए अनेक ऑन अन्य पूर्ण तरीके अपने थे देसी रियासतों के नवाबों में कंपनी के विरुद्ध गहरा असंतोष फैला हुआ था। उसने लैप्स के सिद्धांत को अपनाया था। इस सिद्धांत का अभिप्राय जो देशी रियासतें कंपनी के अधीन है। उनको अपने उत्तराधिकारी के बारे में ब्रिटिश सरकार के मान्यता व स्वीकृत लेनी आवश्यक होगी, अर्थात यदि किसी रियासत के यहां संतान नहीं है तो उसको राज्य करने का अधिकार नहीं होगा । वह ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हो जाएगी यदि ऐसी रियासतें ऐसा नहीं करेंगे तो ब्रिटिश सरकार उत्तराधिकार को अपनी रियासतों का वैद्य शासक नहीं मानेगी। इस नीति के आधार पर डालो जी ने की संतान राजाओं के गोद लेने पर प्रतिबंध लगा दिया था ।
इस आधार पर उसने जैतपुर संबलपुर उदयपुर झांसी नागपुर आदि रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिल लिया उसने अवध के नवाब पर कुशासन का आरोप लगाते हुए 1856 ईस्वी में अवध का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया था। डलहौजी के साम्राज्यवादी नीति के ने भारतीय निर्देशों में ब्रिटिश सरकार के प्रति गिरना और संतोष की भावना उत्पन्न कर दी थी। इसके साथ ही रक्त भक्त लोगों को भी अपने अस्तित्व में संदेह होने लगा था।
वस्तुत डालो जी ने इस नीति ने भारतीय पर बहुत गहरा प्रभाव डाला था। इस परिस्थितियों में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह एक मानवीय आवश्यकता बन गया था।
उसने अवध के नवाब पर कुशासन का आरोप लगाते हुए 1856 ईस्वी में अवध का ब्रिटिश साम्राज्य में पूर्णता विलेख कर लिया। डलहौजी की साम्राज्यवादी नीति ने भारतीय निर्देशों में ब्रिटिश सरकार के प्रति गहरा असंतोष और घृणा पैदा कर दी। इसके साथ ही राजभक्त लोगों को भी अपने अस्तित्व पर पूर्ण रूप से संदेह होने लगा वस्तुतः डलहौजी की इस नीति ने भारतीय पर बहुत गहरा प्रभाव डाला।
इस परिस्थितियों में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह एक मानवीय आवश्यकता के रूप में उभरा।
समकालीन परिस्थितियों:-
भारतीय लोग कहते थे कि अंग्रेज सैनिक कभी हारते नहीं है वह पराजित है। किंतु क्रीमिया और अफगानिस्तान के युद्ध में ब्रिटिशों की जो हर हुई उसने भारतीयों के इस भ्रम को तोड़ दिया।
इसी समय रूस द्वारा क्रीमिया की पराजय का बदला लेने के लिए भारत आक्रमण करने तथा भारत द्वारा उसका साथ देने की योजना की अफवाहें फैला दी गई।
इस भारतीयों में विद्रोह की भावना को बल मिला उन्होंने सोचा कि ब्रिटिशों के रस के विरुद्ध व्यस्त होने के समय वे विद्रोह करके ब्रिटिशों को भारत से भगा देंगे।
सम्राट बहादुर शाह का अपमान:-
मुगल सम्राट बहादुर शाह एक दयालु प्रकृति के व्यक्ति थे। देसी राजा एवं भारतीय जनता भी उन्हें अपना राजा मानती थी। और उनके प्रति श्रद्धा का भाव रखती थी ब्रिटिशों ने मुगल सम्राट बहादुर शाह के साथ बड़ा घिनौना और दुर्व्यवहार किया। अब ब्रिटिशों ने मुगल सम्राट को नजराना देना एवं उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित करना अपराध कर दिया। मुद्रा पर उनका नाम हटा दिया गया।
ब्रिटिशों का नाना साहब के साथ किया गया अन्याय:-
लॉर्ड डलहौजी ने बाजीराव 2nd के दत्तक पुत्र नाना साहब के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया था। नाना साहब की ₹800000 की पेंशन बंद कर दी गई। इसके उपरांत नाना साहब ने ब्रिटिशों को भारत से बाहर निकलने का संकल्प लिया उन्होंने 1857 के विप्लव का नेतृत्व किया।
आर्थिक कारण:-
1857 की क्रांति महत्वपूर्ण कारण थे जिसमें आर्थिक कारण महत्वपूर्ण था।
व्यापार का विनाश:-
अंग्रेजों ने भारत को जमकर लूटा भारत में लूटपाट करके धन प्राप्त किया और उसे इंग्लैंड भेजते रहे ।
ब्रिटिश ने भारत से कच्चा माल इंग्लैंड भेजना शुरू कर दिया और वहां से तैयार हुआ माल भारत में लेकर के आए ।
इसके बाद भारत दिन प्रतिदिन निधन होने लगा यहां की अर्थव्यवस्था खत्म होती गई। इसके कारण भारतीयों के उद्योग धंधे पूर्ण रूप से नष्ट होने लगे
इस प्रकार ब्रिटिशों ने भारतीयों के व्यापार पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया भारतीय अर्थव्यवस्था का यह कल दिन साबित हुआ।
भारतीयों का आर्थिक शोषण किया गया यह सबसे बड़ा आर्थिक कारण था।
किसानों का पूर्ण शोषण:-
किसानों के ऊपर अंग्रेजों ने अनेकों कर लगाई। जिसमें स्थाई बंदोबस्त रैयतवाड़ी महलवाड़ी आदि प्रमुख थे।
किंतु इस सभी प्रथाओं में किसानों का शोषण किया जा रहा था। इस समय किसानों से अत्यधिक लगान वसूल किया जा रहा था। इससे किसानों की माल्या हालत बिगड़ती गई।
समय पर करना चुकाने वाले किसानों की भूमि को नीलाम कर दिया जाता था।
अकाल:-
अंग्रेजों के काल में भारत में बहुत बार काल की स्थिति बनी इस स्थिति में किसानों की ओर स्थिति को जर्जर कर दिया
इनाम में दी गई जगीरो को छीन लिया गया
अंग्रेजों ने जो जागीरे इनाम के तौर पर कुलीन वर्ग को दी गई थी उन्हें धीरे-धीरे वापस लेना प्रारंभ कर दिया जिससे कुलीन वर्ग के कई लोग पूर्ण रूप से निधन हो गए अब उनके पास कोई काम नहीं था मुंबई के विख्यांड इनाम आयोग ने 1852 में 20000 जागीर जब्त की थी।
इससे कुलीन वर्ग में असंतोष बढ़ने लगा जो विद्रोह को बढ़ाने का बड़ा कारण था।
बेरोजगारी:-
यह वह कल था जिसमें लोगों के पास कोई भी कार्य नहीं शेष बचा था। ब्रिटिश द्वारा आप नहीं गई आर्थिक शोषण की नीति के कारण भारत के घरेलू उद्योग धंधे नष्ट होने लगे थे।
देश में व्यापक रूप से बेरोजगारी फैल गई थी। लोगों के पास कोई भी काम नहीं था।
सामाजिक कारण:-
1857 के समाजीकरण निम्न प्रकार है।
ब्रिटिशों द्वारा भारतीयों की सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप:-
ब्रिटिशों ने भारतीयों के सामाजिक जीवन पर पूर्ण रूप से दखल दिया उनके कारण भारत की परंपरावादी एवं रूढ़िवादी जनता उनसे रूष्ट होने लगी।
लॉर्ड विलियम बेंटिक ने सती प्रथा को गैर कानूनी घोषित कर दिया। और लॉर्ड कैनिंग ने विधवा विवाह की प्रथा को मान्यता दे दी। इसके फल स्वरुप जनता में गहरा रोग उत्पन्न होने लगा । इसके अलावा 1856 में पैतृक संपत्ति के संबंध में एक कानून बनाकर हिंदुओं के उत्तराधिकारी नियमों में परिवर्तन कर दिया गया। इसके द्वारा यह निश्चित किया गया कि ईसाई धर्म ग्रहण करने वाले व्यक्ति की पैतृक संपत्ति में हिंसा बना रहेगा। रूढ़िवादी भारतीय अपने सामाजिक जीवन में ब्रिटिश के इस प्रकार के हस्तक्षेप को पसंद नहीं करते थे। तथा उन्होंने विद्रोह का मार्ग अपनाने का निश्चय किया और यह 1857 की क्रांति का एक बहुत बड़ा कारण बना।
ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार:-
अंग्रेजों ने अपनी संस्कृति को बढ़ाने का बहुत प्रयास किया। तथा उन्होंने भारत में इसका प्रचार प्रसार करना प्रारंभ कर दिया। उन्होंने यूरोपीय चिकित्सा विज्ञान को प्रेरित किया जो भारतीय चिकित्सा विज्ञान के विरुद्ध था। भारतीय जनता ने तार एवं रेल को अपनी सभ्यता के विरुद्ध समझा
ब्रिटिशों ने ईसाई धर्म को बहुत प्रोत्साहित किया। स्कूल,अस्पताल,दफ्तर,ईसाई धर्म के प्रचार के केंद्र बन गए थे। अब भारतीयों को विश्वास हुआ कि ब्रिटिश उनकी संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं।
अतः उन्होंने उनके प्रति गहरा असंतोष प्रारंभ करना शुरू कर दिया।
जिससे इस क्रांति का आगाज और बढ़ गया।
अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार प्रसार:-
अंग्रेजी शिक्षा ने भारतीय समाज की मूल विशेषताओं को समाप्त कर दिया। मौलिक करते हुए समाप्त हो गए आभार प्रदर्शन करते हुए पालन परस्पर सहयोग आदि भारतीय समाज की परंपरागत विशेषता थी। किंतु ब्रिटिश शिक्षा ने से पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया। पास जाते सभ्यता ने भारतीयों के रहन-सहन खान-पान आचार विचार शिष्टाचार एवं व्यवहार में क्रांतिकारी परिवर्तन करने प्रारंभ कर दिए।
इस भारतीय सामाजिक जीवन की मौलिकता पूर्ण रूप से समाप्त होने लगी ब्रिटिशों द्वारा अपनी जागृति छीन लेने से कुलीन पूर्ण रूप से नाराज थे।
ब्रिटिशों द्वारा भारतीयों के सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप करने से भारतीय में यह आशंका उत्पन्न हो गई थी।
ब्रिटिश पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार कर रहे थे। भारतीय रूढ़िवादी जनता ने रेल तार आदि वैज्ञानिक प्रयोगों की अपनी सभ्यता के विरुद्ध मनाना प्रारंभ कर दिया। वे यह सोच रहे थे कि यह हमारी सभ्यता को पूर्ण रूप से नष्ट कर देंगे।
भारतीयों के साथ भेदभाव की नीति:-
अंग्रेज भारतीयों के साथ भेदभाव की नीति करते थे ब्रिटिश भारतीयों को निम्न कोटि का मानते थे। तथा उनसे घृणा करते थे। उन्होंने भारतीयों के प्रति भेदभाव की पूर्ण नीति को अपनाना शुरू किया। भारतीयों को रेल के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में सफर करने का अधिकार नहीं था। क्योंकि वहां पर अंग्रेज सफर किया करते थे ब्रिटिश द्वारा संचालित क्लब तथा होटल में भर्ती को प्रवेश नहीं दिया जाता था उनका प्रवेश पूर्ण रूप से बंद था।
धार्मिक कारण:-
भारत में आने को धर्म के लोग निवास करते हैं धर्म ही उनकी निष्ठा का कारण है। भारत में सर्वप्रथम ईसाई धर्म का प्रचार पुर्तगालियों ने किया था। किंतु ब्रिटिश होने से बहुत फैलाया 1831 ईस्वी में चार्टर एक्ट पारित किया गया। जिसके द्वारा ईसाई मिशनरियों ने भारत में आकर अपना धर्म प्रचार करना प्रारंभ कर दिया।
उनको कई सुविधाएं और स्वतंत्रता अंग्रेजों द्वारा दी गई थी। ईसाई धर्म के प्रचार को ने खुलकर हिंदू धर्म और इस्लाम धर्म की निंदा और बुराई करना प्रारंभ कर दिया। वे चाहते थे कि हिंदू और मुसलमान ईसाई धर्म को अपना ले बिंदुओं और मुसलमान के अवतारों पैगंबरों एवं महापुरुषों को खुलकर निंदा करते थे।
तथा उन्हें कुकर्मी कहकर पुकारते थे वह इन धर्म की बुराइयों को बढ़-चढ़कर बताते थे। तथा अपने धर्म को सब धर्म से श्रेष्ठ मानते थे। उन्होंने कई सुविधाएं भारतीयों को दी। जिससे कि उनका मन बदल जाए और वह हमारे धर्म में आकर बस जाए।
1857 की क्रांति का प्रशासनिक कारण:-
अंग्रेजों की नीतियां त्रुटि पूर्ण थी। वह भारत में अपनी ही नीतियों को चलना चाह रहे थे। ब्रिटिशों ने भेदभाव पूर्ण नीति अपनाते हुए भारतीय को प्रशासनिक सेवा में शामिल नहीं किया। वह नहीं चाहते थे कि यह हमारे सामने आकर खड़े हो।
लॉर्ड कॉर्नवालिस भारतीय को उच्च सेवाओं के अयोग्य मानते थे, तथा उन्होंने उच्च पदों पर भारतीयों को हटाकर ब्रिटिश व्यक्तियो को नियुक्त करना प्रारंभ कर दिया।
ब्रिटिश न्याय के क्षेत्र में स्वयं को भारतीयों से उच्च एवं श्रेष्ठ समझते थे।
भारतीय जज किसी ब्रिटिश के विरुद्ध मुकदमे की सुनवाई नहीं कर सकते थे। भारत में ब्रिटिशों की सत्ता स्थापित होने के पश्चात देश में एक नई शक्तिशाली ब्रिटिश अधिकारी वर्ग का उदय हुआ।
यह वर्ग भारतीयों से घृणा करता था। तथा उनसे मिलना तक पसंद नहीं करता था। ब्रिटिशों की इस नीति से भारतीय नाराज हो उठे और उनमें असंतोष फैलने लगा।
1857 की क्रांति का सैनिक कारण सैनिक कारण:-
यह सबसे का बड़ा कारण माना जाता है भारतीय सैनिक अनेक कर्म में ब्रिटिशों से रुष्ट थे उनके वेतन भत्ते पदोन्नति आदि के संबंध में उनके साथ पक्षपात किया जाता था एक साधारण सैनिक का वेतन 7 से 8 रुपए मासिक होता था जिसमें वह खान तथा वर्दी का पैसा देने के बाद उनके पास डेढ़ रुपया बच जाता था भारतीयों के साथ ब्रिटिशों की तुलना में पक्षपात हो रहा था जैसे भारतीय सूबेदार का वेतन ₹35 महीना था जबकि ब्रिटिश सूबेदार का वेतन 195 मासिक होता था भारतीयों को सेवा में उच्च पदों पर नियुक्त नहीं किया जाता था उच्च पदों पर केवल ब्रिटिश ही नियुक्त होते थे।
अनेक विधाओं ने इसकी अलग-अलग परिभाषाएं दी हैं डॉक्टर आरसी मजूमदार ने भारतीय सैनिकों को निडर कहा था उन्होंने इस रोग के तीन कारण बताए थे।
१.बंगाल की सेवा में अवध के सैनिक होते थे जबकि 1856 ईस्वी में अवध को ब्रिटिश साम्राज्य में मिल लिया गया था तो उसमें असंतोष की भावना उत्पन्न होने लगी थी
२. ब्रिटिश होने सिख सैनिकों को बाल काटने के आदेश दिए थे ऐसा न करने वाले सैनिकों को बाहर निकाल दिया जाता था। यह सिख सैनिकों के धर्म के विरुद्ध था।
३. ब्रिटिश सरकार सेवा में ईसाई धर्म का प्रचार कर रही थी वह चाहती थी कि उनके सैनिक भी ईसाई धर्म को अपना ले इस कारण सैनिक अंग्रेजों के प्रति अच्छी भावना नहीं रखते थे वह इसका बदला लेना चाहते थे।
1857 की क्रांति के तात्कालिक कारण:-
1857 की क्रांति एक दिन की क्रांति नहीं थी। इसने पूरे वातावरण को तैयार कर रखा था। फिर बारूद के ढेर पर बैठे थे मंत्र चिंगारी लगाने की आवश्यकता थी। यह चिंगारी चर्बी वाले कारतूसों ने प्रदान की थी इस समय ब्रिटेन में एनफील्ड राइफल का आविष्कार हुआ था। इन रायफलों के कारतूसों को गए एवं सूअर की चर्बी द्वारा चिकन बनाया जाता था।
सैनिकों को अपने मुंह से इसकी टोपी को काटना पड़ता था उसके बाद ही यह कारतूस राइफल में डाली जाती थी। इन चर्बी लगे कार्तिक सैनिक विद्रोह को पूर्ण रूप से अग्नि दी और यह 1857 की क्रांति की शुरुआत का कारण बना।
क्रांति की शुरुआत:-
1857 की क्रांति की शुरुआत का श्रेय मंगल पांडे को जाता है। 29 मार्च 1857 को इसने अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठाई अंग्रेजी सरकार ने भारतीय सेवा के उपयोग के लिए जिन कारतूसों को उपलब्ध कराया था। उनमें सुअर और गाय की चर्बी का प्रयोग किया जाता था। छावनी के भीतर मंगल पांडे को पकड़ने के लिए जो अंग्रेज अधिकारी आगे आए थे, उसे मौत के घाट उतार दिया गया था। 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को फांसी की सजा सुनाई गई थी। उसे फांसी देने के बाद पूरे देश में क्रांति का माहौल बन गया।
मेरठ के सैनिकों ने 10 मई 1857 को जेल तोड़ने प्रारंभ कर दी, भारतीय सैनिकों को मुक्त करना और अंग्रेजों को मारना उनका पहला कार्य बन गया था। मेरठ में मिली सफलता से उत्साहित सैनिक दिल्ली की ओर बढ़ने लगे दिल्ली जाकर क्रांतिकारी सैनिकों ने कर्नल रिप्ले की हत्या कर दी और दिल्ली पर अपना अधिकार जमा लिया।
इसी समय अलीगढ़, इटावा, आजमगढ़, गोरखपुर, बुलंदशहर आदि में भी स्वतंत्रता की घोषणा हो चुकी थी। यह घोषणा सुनकर अंग्रेजी अधिकारियों के हौसले उड़ गए, उन्होंने इस क्रांति को बलपूर्वक दमन करने का फैसला सुनाया ।
विद्रोह के प्रमुख केंद्र तथा नेता प्रमुख थे
इस विद्रोह को प्रारंभ करने का श्रेय सैनिकों को जाता है। कुछ ऐसे लोग भी थे जो सेना में नहीं थे, परंतु उनके आने के बाद के विद्रोह फला फूला,
दिल्ली के जनरल भक्त खान,कानपुर के नाना साहब, लखनऊ के बेगम हजरत महल, बरेली के खान बहादुर, बिहार के कुंवर सिंह, फैजाबाद के मौलवी अहमद उल्लाह, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, इलाहाबाद की लियाकत अली,ग्वालियर की तात्या टोपे और गोरखपुर की गजाधर सिंह शामिल थे, उनके प्रयास से पूरे देश ये विद्रोह में फैल गया।
1857 की क्रांति का क्रूरता पूर्वक दमन:-
इस क्रांति को अंग्रेजों ने बहुत ही गलत तरीके से खत्म की तात्कालिक वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने बाहर से आए सैनिक मंगवा कर तथा जनरल निल के नेतृत्व वाली सेना ने बनारस और इलाहाबाद में क्रांति को जिस प्रकार को कुचला वह पूर्णता मानवीयता से परे थी।
निर्दोष लोगो को भी फांसी दी गई। दिल्ली में बहादुर शाह को गिरफ्तार कर लिया गया और उनका नरसंहार किया।
फुलवार, अंबाला आदि में अंग्रेजों ने हत्याएं करवानी शुरू की। सैनिक नियमों का उल्लंघन कर कैदी सिपाहियों में से अनेकों को तोप के मुंह पर लगाकर उन्हें गले से उड़ा दिया गया । पंजाब में सिपाहियों को घेर कर जिंदा जला दिया गया। अंग्रेजों ने केवल अपनी सैनिक शक्ति के सहारे ही क्रांति का दमन नहीं किया, बल्कि उन्होंने प्रलोभन देकर बहादुर शाह को गिरफ्तार करवाया और उसके पुत्रों की हत्या कर दी।
सिखों और मद्रास सैनिकों को अपने पक्ष में कर लिया वस्तुतः क्रांति के दमन में सिख रेजीमेंट ने यदि अंग्रेजी सरकार की सहायता नहीं की होती तो अंग्रेजी सरकार के लिए क्रांति को रोक पाना कठिन होता। क्रांति के दमन में अंग्रेजों को इसलिए भी सहायता मिली की विभिन्न क्षेत्रो में अलग-अलग समय क्रांति ने जोर पकड़ लिया था।
1857 की क्रांति की असफलता के कारण :-
1857 की क्रांति की असफलता के प्रमुख कारण हैं। 1857 की क्रांति विद्रोह स्थानीय स्तर पर सिमित्र यह संगठित और सीमित रूप में उभरा मुंबई एवं मद्रास की सीन तथा नर्मदा नदी के दक्षिण के राज्यों ने क्रांति के इस विद्रोह में अंग्रेजों का पूर्ण समर्थन किया।
अच्छे साधन का अभाव था तथा धन का अभाव भी इसमें प्रमुख रूप से रहा अंग्रेजी अस्त्र-शास्त्र के सामने भारतीय अर्थशास्त्र कुछ भी साबित नहीं हुए
1857 के इस विद्रोह के प्रति शिक्षित वर्ग पूर्ण रूप से उदासीन बना रहा व्यापारियों एवं शिक्षित वर्ग ने कोलकाता एवं मुंबई में सफाई की अंग्रेजों की सफलता के लिए प्रार्थना भी कि यदि इस वर्ग में अपने लिखे और भाषणों द्वारा लोगों में उत्साह का संचार किया गया होता तो निसंदेह इस क्रांति का परिणाम आज कुछ ओर होत
इस विद्रोह में राष्ट्रीय भावना का पूर्ण रूप से अभाव देखने को मिला क्योंकि भारतीय समाज के सभी वर्गों का सहयोग इस विद्रोह को नहीं मिल सका
सामंतवादी वर्गों में एक वर्ग ने विद्रोह में सहयोग किया परंतु पटियाला जींद ग्वालियर एवं हैदराबाद के राजाओं ने विद्रोह को कोचिंग लेने में अंग्रेजों का पूर्ण समर्थन और सहयोग किया।
यह समय अंग्रेजों के लिए कठिन था अतः संकट के समय लॉर्ड कैनिंग ने कहा था कि यदि सिंधिया भी विद्रोह में सम्मिलित हो जाते हैं तो मुझे कल ही भारत को छोड़ना पड़ेगा विद्रोह दमन के पश्चात भारतीय राजाओं को पुरस्कृत किया गया निजाम को बर का प्रांत लौटा दिया गया और उसके सभी रनों को पूर्ण रूप से माफी मिल गई सिंधिया गायकवाड और राजपूत राजाओं को भी पुरस्कार दिए गए।
विद्रोह में अनुभव संगठन एवं क्षमता का पूर्ण रूप से अभाव था सैनिक दुर्बलता का विद्रोह किस असफलता में महत्वपूर्ण योगदान रहा।
बहादुर शाह जफर एवं नाना साहब एक कुशल संगठन करता थे परंतु वन में सैन्य नेतृत्व की क्षमता में कमी थी जबकि अंग्रेजी सेवा के पास लॉरेंस बंधु निकोलसन हैवलॉक जैसे कुशल सी नायक थे जिन्होंने इस क्रांति को कुचलना का श्रेय हासिल किया
अंग्रेजों के पास आवागमन और संचार के साधनों की कोई कमी नहीं थी उन्होंने रेल की सहायता से इस आंदोलन को पूर्ण रूप से दबा दिया।
1857 की क्रांति के क्या परिणाम हुए:-
1857 की इस महान क्रांति ने पूरे देश में एक नई आशा की किरण को जागृत किया विद्रोह के समाप्त होने के बाद 1858 ईस्वी में ब्रिटिश संसद ने एक कानून पारित कर ईस्ट इंडिया कंपनी के अस्तित्व को पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया और अब भारत पर शासन का पूरा अधिकार महानदी विक्ट्री के हाथों में चला गया।
इंग्लैंड में 1858 ई के अधिनियम के तहत भारतीय राज्य सचिव की व्यवस्था कर दी गई जिसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक मंत्री परिषद बनाई गई। इन 15 सदस्यों में 8 की नियुक्ति सरकार द्वारा करने तथा साथ की कोर्ट आफ डायरेक्टर द्वारा चुने की व्यवस्था की गई थी।
स्थानीय लोगों को उनके गौरव एवं अधिकारों को पुन वापस करने की बात की गई। भारतीय नरेशों को महारानी विक्टोरिया ने अपनी ओर से समस्त संधियों का पालन करने का आश्वासन दिया। लेकिन साथ-साथ नरेशों से इस प्रकार की आशा रखी गई। जैसे विद्रोह से पहले की उन्होंने कहा कि आप शांतिपूर्वक अपना कार्य करें।
अपने राज्य क्षेत्र के विस्तार की अनुक्षा की अभिव्यक्ति के साथ-साथ उन्होंने अपने राज्य क्षेत्र अथवा अधिकारों का अतिक्रमण सहन न करने तथा दूसरों पर अतिक्रमण न करने की बात कही। और साथ ही धार्मिक शोषण खत्म करने एवं सेवाओं में बिना भेदभाव की नियुक्ति का आश्वासन दिया गया।
सनी पुनर्गठन के आधार पर यूरोपीय सैनिकों की संख्या में वृद्धि की गई। उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति को बंद कर दिया गया था तो खाने पूर्ण रूप से अंग्रेजी सेवा के अधिकार में आ गए थे। अब बंगाल प्रेसीडेंसी के लिए सेवा में भारतीय और अंग्रेज सैनिकों का अनुपात दो अनुपात एक हो गया। जबकि मद्रास और मुंबई प्रेसिडेंसी में ही अनुपात 3:1 एक ही रह गया । उच्च जाति के लोगों में से सैनिकों की भर्ती पूर्ण रूप से बंद कर दी गई।
1858 के अधिनियम के अंतर्गत ही भारत में गवर्नर जनरल के पद नाम में परिवर्तन कर उसे वायसराय का परिणाम दिया गया। क्रांति की विद्रोह के फल स्वरुप सामंतवादी ढांचा खत्म हो गया । आम भारतीयों में सामंत वादियों की छवि गद्दार वाली हो गई, क्योंकि इस वर्ग ने विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों का सहयोग दिया था।