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उत्तराखंड राज्य में हुए प्रमुख जन आंदोलन 

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उत्तराखंड राज्य में हुए प्रमुख जन आंदोलन 

उत्तराखंड राज्य में हुए प्रमुख जन आंदोलन 
उत्तराखंड राज्य में हुए प्रमुख जन आंदोलन

उत्तराखंड भारत का प्रमुख अंग है यहां पर अनेकों आंदोलन समय-समय पर होते रहे हैं। इन आंदोलनों ने नहीं उत्तराखंड को अन्य राज्यों से अलग राज्य का दर्जा दिल है यह आंदोलन समय-समय पर होते रहे कई आंदोलन वन संपदा बचाने के लिए कुछ आंदोलन अपने अधिकारों को पानी के लिए किए गए थे। यह आंदोलन निम्न थे ।

कुली बेकार आंदोलन:-

इस आंदोलन को रक्तहीन क्रांति के रूप में भी जाना जाता है।

कुली बेगार प्रथा थी क्या?

कुली बेगार प्रथा में बिना पैसे दिए कुली का कार्य लिया जाता था। अनेकों ग्रामों के प्रधान का यह दायित्व होता था, कि वह एक निश्चित अवधि के लिए निश्चित संख्या में कुली शासक वर्ग को उपलब्ध करागा । इस कार्य हेतु प्रधान के पास बाकायदा एक रजिस्टर बना होता था, जिसमें सभी ग्राम वासियों के नाम लिखे होते थे। और सभी को बारी-बारी काम करना होता था। यह एक महत्वपूर्ण कार्य था यदि यह कार्य नहीं किया जाता तो उक्त व्यक्ति को सजा दी जाती थी। यह एक घोषित बेगार प्रथा थी, और इसके अतिरिक्त शासक वर्ग के भ्रमण के दौरान उनके खान-पान से लेकर हर ऐसो आराम की सुविधा भी उक्त व्यक्ति को ही जुटानी पड़ती थी।

कुली बेकार आंदोलन का कारण:-

ग्राम में सबसे बड़ा पद प्रधान का होता था, उसके बाद जमीदार तथा पटवारी भी इसमें शामिल कर लिए जाते थे।  जमीदारों और पटवारी की मिली भगत से वे आपसी भेदभाव के कारण जनता के बीच असंतुष बढ़ाने का कार्य करते थे क्योंकि गांव के प्रधान व पटवारी अपने व्यक्तिगत हितों को साधने या बीरभाव निकालने के लिए इस कुर्ती को बढ़ावा देने लगे थे|  इस प्रथा के खिलाफ लोग एकत्रित होने लग गए थे। कभी-कभी तो लोगों को अत्यंत घृणा का सामना करना पड़ता था। जैसे कि अंग्रेज को अपनी शोच आसन या गंदे कपड़े आदि को लेकर जाना ।

इसके विरोध में भी लोग इकट्ठे होने लगे थे।अंग्रेज़ों द्वारा कुलियों की शारीरिक व मानसिक रूप से दोहन किया जा रहा था।

उत्तराखंड में कुली बेगार आंदोलन का इतिहास:-

उत्तराखंड में चंद्र शासकों ने आंदोलन को चलाया था। चंद शासको ने राज्य में घोड़े से संबंधित घोडालो निरूपित किया था। जिसमें कुली बेगार  प्रथा का यह प्रारंभिक चरण माना जाता था आगे चलकर गोरखाओं के शासन काल में भी इस प्रथा ने व्यापक पैर फसा रहे थे।  अंग्रेजों ने इसे प्रारंभ में समाप्त कर दिया परंतु धीरे-धीरे अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को पूर्ण लागू किया।

 अंग्रेज इसके दमनकारी रूप तक नहीं पहुंच पाए पहले यह कर तब आम जनता पर नहीं वरन उन मालगुजारों पर आरोपित किया जाता था। जो भू स्वामियों या जमीदारों से कर वसूलते थे।

इस आंदोलन की पृष्ठभूमि:- 

1857 में सैनिक विद्रोह की चिंगारी कुमाऊं में भी फैली थी, हल्द्वानी, कुमाऊं क्षेत्र का प्रवेश द्वार था।  वहां से उठे विद्रोह का स्वर को इसकी प्रारंभिक अवस्था माना जाता था। अंग्रेज इस आंदोलन को कुचलना में पूर्ण रूप से सफल हुए थे।  लेकिन उसे समय की दमन का जब छुटपुट रूप से समय-समय पर विभिन्न प्रतिरोधों के रूप में टूटा फूटता रहा था।  इसमें अंग्रेजी द्वारा कुमाऊं के जंगलों की और उनके दोहन से उपजाऊ व असंतोष भी था।  यह असंतोष वसीभूत होते-होते एक बार फिर 20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में कुली विद्रोह के रूप में फूट पड़ा

 1913 में कुली बेगार प्रथा यहां के निवासियों के लिए अनिवार्य कर दिया गया।  इसका हर जगह पर विरोध किया गया।  बद्री दतपांडे जी ने इस आंदोलन की अगुवाई की की थी।  अल्मोड़ा अखबार के माध्यम से उन्होंने इस कुर्ती के खिलाफ जन जागरण के साथ इसका विरोध प्रारंभ कर दिया था ।

नागपुर अधिवेशन:-

1920 में नागपुर में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन संपन्न हुआ।  जिसमें श्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत, श्री बद्री दत्त पांडे , श्री हरगोविंद पंत, विक्टर मोहन जोशी, श्यामलाल शाह आदि लोग प्रमुख रूप से सम्मिलित हुए थेऔर बद्री दत्त पांडे जी ने कुली बेकार आंदोलन के लिए महात्मा गांधी से आशीर्वाद लिया था।

इन्होंने  वापस आकर इस कुरीति के खिलाफ जन जागरण करना प्रारंभ कर दिया था। वे जानते थे यह आंदोलन जल्द ही सफल होगा।

कुली बेकार प्रथा का पूर्ण अंत:-

13 14 जनवरी 1921 को उत्तरायणी पर्व के अवसर पर कुली बेगार आंदोलन की शुरुआत हुई थी इस आंदोलन में आम आदमी की पूर्ण रूप से सहभागिता रही थी । अलग-अलग गांव से आए लोगों  ने एक विशाल के प्रदर्शन किया ।

सरयू और गोमती के संगम के मैदान से इस आंदोलन का प्रारंभ हुआ।  इस आंदोलन के शुरू होने से पहले जिलाधिकारी द्वारा पंडित हरगोविंद  पंत  चिरंजीलाल और बद्री दत्त पांडे को नोटिस थमा दिया गया था।

  लेकिन इसका उन पर कोई असर नहीं हुआ उपस्थित जन समूह सबसे पहले बागनाथ जी के मंदिर में जाकर पूजा अर्चना की ओर 40000 लोगों के जुलूस सरयू बागड़ की ओर कूच  किया | जुलूस में सबसे आगे एक झंडा था जिस पर लिखा था।  कुली बेगार बंद करो बंद करो

 इसके बाद सरयू मैदान में एक सभा हुई इस सभा को संबोधित करते हुए श्री बद्री दत्त पांडे जी ने यह कहा पवित्र सरयू का जल लेकर बागनाथ मंदिर को साक्षी मानकर प्रतिज्ञा करो कि आज से कुली उतार कुली बेकार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा ।

सभी लोगों ने यह शपथ ली कि हम इसको प्रथा को खत्म कर देंगे और ग्राम प्रधान से रजिस्टर लेकर उसको फाड़ दिया गया यही से इसको प्रथा का पूर्ण रूप से अंत हो गया था ।

उस समय अल्मोड़ा के तात्कालिक डिप्टी कमिश्नर डबल थे उसने बद्री दत्त पांडे जी को अपने पास बुलाया और कहा तुमने दफा 144 का उल्लंघन किया है।  तुम यहां से तुरंत निकल जाओ नहीं तो तुम्हें हिरासत में ले लिया जाएगा। बद्री दत्त पांडे जी ने कहा कि अब मेरी लाश यहां से जाएगी । यह सुनकर वह गुस्से से लाल हो गया उसने भीड़ पर गोली चलानी चाहिए।

 लेकिन पुलिस बल कम होने के कारण उसे वह कुछ नहीं कर सका इस सफल आंदोलन के बाद जनता ने बद्रीनाथ पांडे जी को कुमाऊं केसरी की उपाधि दी।

 इस आंदोलन का लोगों ने समर्थन ही नहीं किया बल्कि कड़ाई से पालन भी किया। इस प्रथा के विरोध में लोगों को प्रदर्शन जारी रखने के लिए कहा गया इस प्रथा ने सरकार को सदमे में डाल दिया गया। अंत में सरकार ने सदन में एक विधेयक लाकर इस प्रथा को समाप्त कर दिया |

आंदोलन से महात्मा गांधी बहुत प्रभावित हुए और वह स्वयं बागेश्वर आए चंदौली में गांधी आश्रम की स्थापना की गई । इसके बाद गांधी जी ने यंग इंडिया में इस आंदोलन के बारे में लिखा था इसका प्रभाव संपूर्ण था और यह एक रक्तहीन क्रांति थी।

उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल 

DEHRADUN

 

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